सात दिवसीय श्री मद भागवत कथा का गुरुवार को हुआ समापन।

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सात दिवसीय श्री मद भागवत कथा का गुरुवार को हुआ समापन।

 

खीरों (रायबरेली ) विकास क्षेत्र के गाँव सहजनवारी मजरे धुराई के स्थित बाबा मंगलेश्वर मन्दिर परिसर में सात दिवसीय श्री मद भागवत कथा का गुरुवार को समापन किया गया । जिसमे वाराणसी से पधारे ख्याति प्राप्त कथावाचक स्वामी प्रबल जी महाराज ने कथा के साथ साथ भगवान श्री कृष्ण की लीला की मनमोहक झांकियो माध्यम से मौजूद भक्तों को ज्ञान गंगा प्रवाह में गोते लगवाये । आयोजित इस कथा के समापन के अवसर पर हवन पूजन और कन्या भोज व विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया । जिसमे सहजनवारी सहित क्षेत्र कई गांवों के सैकड़ों महिला-पुरुष भक्तों हवन पूजन कर प्रसाद ग्रहण किया ।


वाराणसी के कथावाचक स्वामी महेश प्रबल जी महाराज ने श्री मद भागवत कथा के अंतिम दिन की कथा के बीच-बीच बाल कलाकारों द्वारा मनमोहक झांकियों के सुन्दर दृश्यों के साथ उपस्थित भक्तों को बताया कि सुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को श्री मद भागवत की कथा सुनाते हुये बताया कि भोले बाबा कैलास पर बाड़ाश्वर की भक्ती से प्रसन्न होकर डमरू बजाकर नाचने लगे और उसे इच्छित वर दिया वर पाकर बाड़ाश्वर भगवानशंकर से ही युद्ध करने को तैयार होगया तब भोलेनाथ ने उसे एक झण्डा देकर कहा इसे आपने महेल मे लगादेना और जिस दिन यह झण्डा झुक जाय तो समझ लेना कि तुम से लड़ने योग्य वीर आगया है । उसके बाद की कथा में बताया कि सुदामा और श्री कृष्ण बचपन के मित्र थे । गुरुकुल में सन्दीपन गुरु के आश्रम में रह कर दोनों लोगों ने एक साथ शिक्षा-दीक्षा ली । निज कर्मों के प्रभाव से सुदामा दरिद्र हो गए और दीन हीन दशा में पत्नी सुशीला के साथ जिंदगी बिताने लगे । सुशीला के बार-बार समझाने पर सुदामा श्री कृष्ण से मिलने द्वारिकापुरी गए । राजा , मित्र , गुरु द्वारे रिक्त हस्तम न गंतव्यम् ।

इस भावना के कारण वह अपने साथ सुशीला के द्वारा दिये गए थोड़े से चावल भेंट में ले गए । लेकिन श्री कृष्ण के वैभव को देखकर वह संकोच वश चावलों की पोटली छिपा रहे थे । द्वारिकाधीश श्री कृष्ण ने महलों में सुदामा का बड़ा सम्मान किया । उनकी दशा देखकर श्री कृष्ण की आँखों में आँसू आ गए । सुदामा के पैर धोने के बाद वह चावलों की पोटली छीन कर श्री कृष्ण ने खाना शुरू कर दिया । दो मुट्ठी खाने के बाद तीसरी मुट्ठी में रुक्मिणी ने श्री कृष्ण का हांथ पकड़ लिया और कहा कि आपने इसे तो दो लोकों का स्वामी बना दिया । अब तीसरी मुट्ठी खाने के बाद आप खुद कहाँ रहेंगे ।

इसका ध्यान भी तो रखो । सुदामा जब अपने नगर लौटे तो उन्होने देखा कि जैसा राज समाज द्वारिका में था वैसा ही यहाँ है । वह लोगों से अपनी कुटी के बारे में पूंछ ही रहे थे कि सुशीला ने दाशियों को भेजकर सुदामा को बुलाया । सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता से हमे यही शिक्षा मिलती है कि यदि एक मित्र दुखी हो तो दूसरे मित्र का सुखी रहना पाप है । इसी तरह ज्ञान गंगा के प्रवाह में भक्त गोते लगाते रहे । इस मौके पर धीरज पाण्डे (परीक्षित ) देवदत्त शुक्ला, सूरज पाण्डे , रौनक तिवारी, संतोष , राम मोहन , राम प्रसाद , मनोज पाण्डे , राम जी , विजय ,अनिलकुमार , जागेश्वर सहित क्षेत्र के अनेक गांवों के सैकड़ों महिला पुरुष भक्त मौजूद थे ।

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